एक फैसले ने बदली तस्वीर, गया के दो गांवों ने लिखी तरक्की की कहानी
गया। जिले के एक छोटे से गांव ने वह कर दिखाया, जो अक्सर सरकारें भी वर्षों में नहीं कर पातीं। वर्ष 2014 में ग्रामीणों ने मिलकर शराबबंदी लागू की और आज यह गांव शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुधार की अनोखी मिसाल बन चुका है।
2014 में ही लागू कर दी शराबबंदी
बिहार में 2016 में लागू हुए शराबबंदी कानून से दो साल पहले ही गया जिले के बाकेंबाजार थाना क्षेत्र के बालासोत और हरिदासपुर गांव के लोगों ने ऐतिहासिक फैसला लिया था। वर्ष 2014 में ग्रामीणों ने महसूस किया कि शराब की वजह से लोग अपनी कमाई बर्बाद कर रहे हैं और बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। इसका परिणाम यह था कि गांव में अधिकतर लोग अशिक्षित रह गए थे।
युवाओं ने संभाली जिम्मेदारी
इस स्थिति को बदलने के लिए गांव के युवाओं ने पहल की और बुजुर्गों के साथ मिलकर एक मजबूत सामाजिक व्यवस्था बनाई। दोनों गांवों के लोगों ने मिलकर 21 सदस्यीय टीम का गठन किया, जिसका मुख्य उद्देश्य शराबबंदी को सख्ती से लागू करना था। नियम साफ था कि जो भी व्यक्ति शराब पीकर गांव में आता, उसे पकड़कर दंडित किया जाता।
जुर्माने से हुआ विकास कार्य
दंड के तौर पर शराब पीने वालों से 100 रुपये से लेकर 2000 रुपये तक जुर्माना वसूला जाता था। इस राशि का उपयोग सामाजिक कार्यों में किया गया। हरिदासपुर गांव में लगभग दो लाख रुपये की लागत से एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। इसके अलावा इस पैसे से गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद भी की जाती रही।
सरकारी कानून से पहले बना उदाहरण
जब वर्ष 2016 में बिहार सरकार ने राज्यभर में शराबबंदी लागू की, तब तक यह गांव इस दिशा में काफी आगे निकल चुका था। आज भी यहां बनाए गए नियमों का सख्ती से पालन किया जा रहा है। इसका असर यह हुआ कि गांव का सामाजिक माहौल पूरी तरह बदल गया है। अब युवा रोजगार और नौकरी की ओर बढ़ रहे हैं और हर घर के बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
शिक्षा और शांति में बड़ा बदलाव
बालासोत गांव के युवा श्री यादव के अनुसार, वर्ष 2014 में ही गांव ने शराबबंदी का निर्णय लिया था। नियम के तहत पहली गलती पर 500 रुपये, दूसरी बार 1000 रुपये और अधिक हंगामा करने पर 2000 रुपये तक का जुर्माना तय किया गया। इस सख्ती का असर यह हुआ कि गांव में शांति का माहौल बनने लगा। पहले जहां झगड़े और जातीय तनाव की स्थिति रहती थी, वहीं अब लोग आपसी सद्भाव के साथ रहने लगे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि शराब पीने वाले लोग पुलिस से ज्यादा गांव के नियमों से डरते हैं।
रोजगार और शिक्षा में आई तेजी
शराबबंदी के बाद गांव में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है। वर्ष 2014 से पहले जहां मुश्किल से एक युवक को नौकरी मिली थी, वहीं इसके बाद दर्जनों युवाओं को रोजगार मिला। गांव में जुर्माने की राशि से मंदिर निर्माण भी कराया गया है। करीब 300 घरों और 1200 की आबादी वाले इस गांव में अब शांति और विकास की नई तस्वीर देखने को मिल रही है।
गांव की पहल बनी प्रेरणा
गांव के युवा दिनेश कुमार के अनुसार, बिहार सरकार के शराबबंदी कानून से पहले ही गांव में यह नियम लागू कर दिया गया था। इसके बाद गांव में सकारात्मक बदलाव देखने को मिला और शिक्षा का स्तर तेजी से बढ़ा। पहले जहां अधिकतर लोग अनपढ़ थे, वहीं अब लगभग हर घर शिक्षा से जुड़ चुका है। जुर्माने की राशि से हरिदासपुर गांव में मंदिर का निर्माण कराया गया और जरूरतमंदों की मदद भी की जाती है।
नियम तोड़ने वालों पर सख्ती
गांव के युवा सुबेदार यादव ने बताया कि बालासोत और हरिदासपुर गांव में 21-21 लोगों की टीम बनाकर शराबबंदी को सख्ती से लागू किया गया। गांव में शराब पीना ही नहीं, बल्कि लाना भी पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया। नियम तोड़ने वालों को पकड़कर दंडित किया जाता था और उनसे माफी मंगवाई जाती थी, ताकि उनके परिवार और बच्चे बेहतर जीवन जी सकें।
सरकारी सहायता का इंतजार
शराबियों से वसूले गए जुर्माने की राशि से गांव में भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। हालांकि, सरकार द्वारा पूर्ण शराबबंदी वाले गांव को एक लाख रुपये देने की घोषणा की गई थी, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि अब तक यह राशि नहीं मिली है।
समाज चाहे तो बदलाव संभव
बालासोत और हरिदासपुर गांव आज इस बात का जीता-जागता उदाहरण हैं कि अगर समाज ठान ले, तो बदलाव संभव है। यह पहल न केवल शराबबंदी की सफलता की कहानी है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक प्रेरणा भी है।
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