शांति की पहल या रणनीति? Iran के प्रस्ताव पर उठे सवाल
वॉशिंगटन: मध्य पूर्व में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच छिड़ा संघर्ष अब एक ऐसे विनाशकारी मोड़ पर आ खड़ा हुआ है, जहाँ शांति की अपीलों के बीच बारूद की गंध और तेज हो गई है। वैश्विक कूटनीति में समाधान के प्रयास तो हो रहे हैं, लेकिन समुद्र में व्यापारिक जहाजों पर लगातार होते हमले और नौसैनिक घेराबंदी ने पूरी दुनिया की आपूर्ति व्यवस्था को संकट में डाल दिया है। रविवार को होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) के पास एक मालवाहक जहाज पर हुए ताजा हमले ने हफ्तों से बनी अस्थाई शांति को पूरी तरह खत्म कर दिया है। ब्रिटिश समुद्री सुरक्षा एजेंसी के अनुसार, छोटी नावों के जरिए किए गए इस हमले ने अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों की सुरक्षा पर एक बार फिर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
होर्मुज जलमार्ग पर ईरान की नई शर्तें और वैश्विक ऊर्जा संकट
दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा ढोने वाले होर्मुज जलमार्ग पर ईरान ने अब बेहद सख्त और अड़ियल रुख अपना लिया है। तेहरान ने इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों पर 'टोल टैक्स' वसूलने की नई शर्त थोप दी है, साथ ही अमेरिका और इजरायल से जुड़े किसी भी जहाज के प्रवेश पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी है। ईरान की इस नीति ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में भारी अनिश्चितता पैदा कर दी है। हालांकि, तनाव कम करने के लिए ईरान ने पाकिस्तान के जरिए अमेरिका को एक 14-सूत्रीय शांति प्रस्ताव भी भेजा है, जिसमें एक महीने के भीतर विवाद सुलझाने का खाका पेश किया गया है। लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कड़ा रुख दिखाते हुए स्पष्ट किया है कि वे ईरान की पुरानी गतिविधियों को देखते हुए उसे इतनी आसानी से कोई बड़ी राहत देने के पक्ष में नहीं हैं।
अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी और ईरान की चरमराती अर्थव्यवस्था
ईरान पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका ने उसके बंदरगाहों की अभूतपूर्व नौसैनिक घेराबंदी कर रखी है, जिसका उद्देश्य ईरान के तेल निर्यात को पूरी तरह ठप करना है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड की इस नाकेबंदी के कारण ईरान के तेल भंडार अब अपनी अधिकतम क्षमता तक भर चुके हैं, जिससे वहां के तेल कुओं को बंद करने की नौबत आ गई है। अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि अब तक लगभग 49 जहाजों को ईरान की ओर जाने से रोका जा चुका है, जिससे ईरानी अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ रहा है। यह आर्थिक घेराबंदी इतनी सख्त है कि इसने ईरान को रणनीतिक रूप से पीछे हटने या कड़े फैसले लेने पर मजबूर कर दिया है।
कूटनीतिक मध्यस्थता और समाधान की अंतिम कोशिशें
एक तरफ जहां युद्ध के मैदान में तनातनी जारी है, वहीं दूसरी तरफ पर्दे के पीछे समाधान की तलाश भी तेज हो गई है। ओमान और पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच मुख्य मध्यस्थ के रूप में उभरकर सामने आए हैं। ईरान के विदेश मंत्री और ओमान के प्रतिनिधियों के बीच हालिया चर्चाओं से यह संकेत मिलते हैं कि दोनों पक्ष किसी न किसी तरह के समझौते की संभावना टटोल रहे हैं। वर्तमान में मिडिल ईस्ट में सैन्य कार्रवाई, आर्थिक प्रतिबंधों और कूटनीतिक वार्ताओं का एक ऐसा जटिल त्रिकोण बन चुका है, जिसका प्रभाव आने वाले समय में न केवल इस क्षेत्र की राजनीति पर, बल्कि पूरी दुनिया की आर्थिक स्थिरता पर भी पड़ेगा।
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